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बुंदेलखंड में पारंपरिक तरीके से मनाई गई ‘लट्ठमार दिवाली’, ढोल की थाप पर लाठियों का अचूक वार; देखें VIDEO

देश में आज धूम-धाम से दिवाली मनाई जा रही है. आपने अब तक दिए जलाकर, पटाखे फोड़कर या फिर फूलों से घर सजाकर दिवाली मनाने की बात सुनी होगी लेकिन बुंदेलखंड एक कई जिलों में पारंपरिक ‘लट्ठ मार दिवाली’ भी मनाई जाती है. असल में ये एक पारंपरिक नृत्य है जो कि ढोलक, ढाल और लाठियों के साथ किया जाता है. बुंदेलखंड के कई इलाकों में आज भी ये ‘लट्ठ मार’ दिवाली काफी धूमधाम से मनाई गई. जालौन से इस तरह से दिवाली मनाने का एक वीडियो भी सामने आया है.

बता दें कि बुंदेलखंड परंपराओं और संस्कृति का इंद्रधनुष सहेजे है, फिर चाहे रक्षाबंधन के दूसरे दिन राखी बांधने की परंपरा हो या फिर पितृपक्ष में महबुलिया सिरवाने की परंपरा, यहां का अंदाज देश के कई हिस्सों से काफी अलग है. इन्हीं परंपराओं में एक है मां लक्ष्मी का सामूहिक पूजन भी शामिल है. बीते 30 साल से यहां सार्वजनिक पंडाल सजाकर दुर्गापूजा की तरह लक्ष्मी पूजन होता है. इसी तरह बरसाने की लट्ठमार होली तो आपने देखी और सुनी होगी, लेकिन उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके की लट्ठमार दिवाली भी कम मशहूर नहीं है.

काफी रोमांचक होती है ‘लट्ठ मार दिवाली’

बुंदेलखंड के कई इलाकों में मनाई जाने वाली ये ‘लट्ठ मार’ दिवाली काफी रोमांचक होती है. बुंदेलखंड के जनपद महोबा, हमीरपुर, जालौन और बांदा में परंपरागत ‘दिवारी नृत्य’ की धूम मची हुई है, जिसमें ढोलक की थाप पर थिरकते जिस्म के साथ लाठियों का अचूक वार करते हुए युद्ध कला को दर्शाने वाले नृत्य को देख कर लोग दांतों तले अंगुलियां दबाने पर मजबूर हो जाते हैं. दिवारी नृत्य करते युवाओं के पैंतरे देखकर ऐसा लगता है मानों वो दिवाली मनाने नहीं बल्कि युद्ध का मैदान जीतने निकले हों.

द्वापर युग से चली आ रही परंपरा

बुंदेलखंड का ‘दिवारी लोक नृत्य’ गोवधन पर्वत से भी संबंध रखता है. द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने जब गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था, तब ब्रजवासियों ने खुश होकर यह दिवारी नृत्य कर श्रीकृष्ण की इंद्र पर विजय का जश्न मनाया और ब्रज के ग्वालों ने इसे दुश्मन को परास्त करने की सबसे अच्छी कला माना. इसी कारण इंद्र को श्रीकृष्ण की लीला को देखकर परास्त होना पड़ा.

हमीरपुर में दिवारी नृत्य की धूम

बुंदेलखंड में धनतेरस से लेकर दिवाली की दूज तक गांव-गांव में दिवारी नृत्य खेलते नौजवानों की टोलियां घूमती रहती हैं. दिवारी देखने के लिए हजारों की भीड़ जुटती है. दिवारी खेलने वाले लोग इस कला को श्रीकृष्ण द्वारा ग्वालों को सिखाई गई आत्मरक्षा की कला मानते हैं. हमीरपुर जिले में इस समय दिवारी नृत्य की धूम मची है.

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