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विष पिया इष्ट, सावन हुआ विशिष्ट ।

आचार्य सौरविद नूतन जी महाराज ने बताया कि चारों तरफ हरियाली ही हरियाली जलभराव के कारण सर्पों के साथ साथ अन्यादि विषाणु व कीट पतंगादियो जनित बीमारियां पांव पसारती है । भगवान विष्णु पालनकर्ता शयन को चले जाते है, इन दिनों में ही महादेव दोहरी जिम्मेदारी निभाते हुए पालनकर्ता रूप में आ जाते हैं ।वह हमारी रक्षा करते हुए हम पर कृपा बरसाते है ।हम सभी पूरे श्रावण मास में उन पर औषधि न्यौछावर करते हैं । उन्ही औषधियो द्वारा हमारे दु:ख,दर्द, जरा,पीड़ा,कष्ट व व्याधियों को दूर करते हैं। महादेव का प्रिय धतूरा सूजन, चोट , गूदारोग ,अपश्मार,मिले,मिर्गी, गठिया, गंजापन,व बाझपन में लाभकारी है ।

आक(मंदार)तिक्त एवं स्निग्ध उष्णवीर्य लवण रसयुक्त होने के कारण कृमि,वात, उदर,चमड़ी,व गूदारोग नाशक है। इसकी जड़ गरम व वमनकारी होने से उपदंश व श्वास रोग में लाभकारी है, तथा इसका पूष्प वृष्ण यानी बलकारक कहा गया है । विजया(भांग)जोड़ो के दर्द के साथ साथ पाचनतन्त्र को ठीक करता है । शिव के वैद्यक गुणों वाला होने से ही इनका परली में विराजित स्वरूप वैद्यनाथ महादेव है ।

शिव के एकादश स्वरूपों को एकादश वस्तु भी प्रिय है। उसमें धतूरा, मंदार, भांग के साथ साथ दूध, कपूर,भस्म, अच्छत,चन्दन, रूद्राक्ष,विल्वपत्र,व जल अतिप्रिय है । यदि उपरोक्त सामग्रियो से श्रावण में शिवार्चन करके हम सब लौकिक भव बाधा से मुक्त होकर निश्चित रूप से ग्रहों के दुष्प्रभाव को सूप्रभाव में परिणित रूपों को परिलक्षित हूआ अनुभव करेंगे, क्योंकि सौरमण्डल को संचालक सूर्य देव श्रावण में शिव के शिश विराजित चन्द्र की राशि में रहते हैं या अभिलाषी होते हैं ऐसे में शिव आराधना से ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त होती हैं । पौराणिक काल से श्रावण मास हर्षोल्लास के साथ ही मनाए जाने वाला त्यौहार नहीं अपितु अद्वितीय शक्तियों से युक्त नववर्ष के रूप मे मनाया जाता रहा है ,आज भी हमारी कृषि प्रधान संस्कृति में नववर्ष फसली सन के नाम से मनाया जाता है, तथा इसी को आधार मानकर ही विद्यालयों में नये शिक्षा सत्र की शुरुआत भी जुलाई महीने से ही किया गया । श्रावण मास का शिवार्चन शिवकृपा के साथ साथ श्रीअन्नपूर्णा माता की स्नेह के वर्षा का पर्व है ।

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