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गहलोत और पायलट के बीच की सियासी दूरी कोई नई नहीं, टिकट बंटवारे को लेकर उभरा था मतभेद

जयपुर। राज्यसभा चुनाव से शुरू हुआ सियासी ड्रामा अब कांग्रेस के गले की फांस बनता जा रहा है। राजस्थान में सियासी उठापटक तेज हो गई। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की दूरियां भी बढ़ती जा रही है। वैसे तो इन दोनों नेताओं के बीच का मतभेद कोई नया नहीं है। इसकी शुरूआत तब से होती है जब गहलोत अपने दूसरे कार्यकाल का चुनाव हार गए थे और फिर सचिन पायलट का प्रदेश कांग्रेस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

इसी बीच लोकसभा चुनाव हुआ और सचिन पायलट की अगुवाई में लड़े गए चुनाव में कांग्रेस ने 25 की 25 लोकसभा सीटों पर हार का सामना किया। इसके बावजूद कांग्रेस आलाकमान ने पायलट पर भरोसा जताया और उनके फैसलों का समर्थन किया। तभी अशोक गहलोत ने केंद्र की राजनीति की तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया था। अशोक गहलोत कांग्रेस महासचिव की हैसियत से पार्टी में काम करते रहे और 10 जनपथ के साथ अपने रिश्तों को धीरे-धीरे और भी मजबूत कर लिया फिर हिमाचल प्रदेश, पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पार्टी को मजबूत किया। इसके बाद वापस से गहलोत ने प्रदेश पर ध्यान देना शुरू किया।

मुख्यमंत्री पद को लेकर हुई तनातनी

कांग्रेस ने 2018 का विधानसभा चुनाव जीत लिया लेकिन इस चुनाव से पहले ही अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच दूरियां बढ़ गई। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सचिन पायलट को टिकट बंटवारे को लेकर खुली छूट दे दी थी और फिर राजनीति के माहिर खिलाड़ी अशोक गहलोत ने अपने खेमे के लोगों को निर्दलीय चुनाव लड़ाया और करीबी लोगों में शामिल सुभाष गर्ग को राष्ट्रीय लोक दल से समझौते के आधार पर खड़ा करा दिया।

बहुमत से एक सीटे पीछे रह जाने पर अशोक गहलोत ने निर्दलीय विधायकों से समर्थन हासिल कर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। निर्दलियों का समर्थन प्राप्तकर गहलोत ने आलाकमान को अपनी ताकत से रूबरू करा दिया फिर भी राहुल गांधी आखिरी तक सचिन गहलोत को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन ये हो न सका और उन्हें उप मुख्यमंत्री पद से काम चलाना पड़ा।

साथ में दोनों नेताओं ने ली शपथ

उप मुख्यमंत्री का पद कैबिनेट दर्जे का होता है। इसके बावजूद सचिन पायलट ने जिद करते हुए मुख्यमंत्री के साथ उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और जनता के सामने एक संदेश दिया कि उनका कद अशोक गहलोत से कम नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जब विधायकों को मंत्री परिषद की शपथ लेनी थी उस वक्त सचिन पायलट ने अपनी कुर्सी राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बगल में लगवाई थी। उस वक्त अशोक गहलोत ने उन्हें समझाने का भी प्रयास किया था और कहा था कि उप मुख्यमंत्री का पद कोई संवैधानिक पद नहीं होता है लेकिन सचिन कहां मानने वाले थे।

जैसे-जैसे सरकार रणनीतियां बनाने में व्यस्त हो गई और समय गुजरता गया ठीक उसी प्रकार सरकारी फैसलों में सचिन की हिस्सेदारी भी कम होती गई। जो विधायक कभी सचिन के करीबी हुआ करते थे उन पर अब गहलोत की पकड़ मजबूत होने लगी थी। ऐसे में सचिन पायलट अकेला महसूस करने लगे थे और वह राहुल गांधी से बात करना चाहते थे। जानकार बताते हैं कि राहुल गांधी और सचिन पायलट के बीच करीब एक साल से बातचीत नहीं हुई है।

यह वही राहुल गांधी हैं जो कभी सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे और चुनाव के वक्त अशोक गहलोत और उन्हें एक साथ एक बराबरी का तौलते थे। रैलियों में दोनों नेताओं का हाथ एक साथ उठाते थे लेकिन अब दूरियां बढ़ गईं और इतनी ज्यादा बढ़ गईं कि सचिन पायलट ने बगाबत कर दी है। सूत्र बताते हैं कि सचिन पायलट सोमवार शाम तक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात कर सकते हैं।

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