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जमानत पर आरोपी की सोशल मीडिया से दूरी है जरूरी, SC ने केंद्र और UP सरकार से मांगा जवाब

किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को कारागार से छुड़ाने के लिये न्यायालय के समक्ष जो सम्पत्ति जमा की जाती है या देने की प्रतिज्ञा की जाती है उसे कहते हैं जमानत। जमानत पाकर न्यायालय इससे निश्चिन्त हो जाता है कि आरोपी व्यक्ति सुनवाई के लिये अवश्य आयेगा अन्यथा उसकी जमानत जब्त कर ली जायेगी और सुनवाई के लिये न आने पर फिर से पकड़ा जा सकता है। ज़मानत पर रिहा होना का मतलब है कि आपकी स्वतंत्रता की सीमाएं हैं।

आज कल सोशल मीडिया का इस्तेमाल आम जन जीवन का एक अमूल्य हिस्सा बन चुका है। लेकिन बीते दिनों एक खबर जो काफी चर्चा में रही। मामला था इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ा जिन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव के प्रत्याशी सचिन चौधरी को जमानत देते वक्त सोशल मीडिया से दूरी रखने की शर्त लगाई। हालांकि, अदालत ने बाद में एक जून को अपने आदेश में संशोधन कर, सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करने की अवधि 18 महीने या फिर मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक, इनमें से जो भी पहले हो, सीमित कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में चनौती

अमरोहा के कांग्रेस नेता ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनती दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और यूपी सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल ये है कि क्या इस तरह के प्रतिबंध तब लगाए जा सकते हैं जब अपराध का सोशल मीडिया पहुंच से कोई लेना-देना न हो।

क्या कहा CJI ने

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एस ए बोबडे ने कहा, “हमें नहीं लगता कि यह बहुत बुरा है कि अगर सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की भागीदारी क्षति करती है तो अदालत यह क्यों नहीं कह सकती कि आप उस उपकरण का उपयोग न करें जिसके द्वारा आप क्षति करते हैं? याचिकाकर्ता की ओर से सलमान खुर्शीद ने कहा कि मेरे मुवक्किल के खिलाफ सोशल मीडिया के इस्तेमाल से संबंधित कोई आरोप नहीं है। सीजेआई ने कहा कि हम इस पर कानून बनाना चाहते हैं।

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