कारोबारबड़ी खबर

मोदी सरकार के किफायती कदमों और बड़े रिफॉर्म्स से अर्थव्यवस्था ने पकड़ी तेजी, आसान हुई ईंधन के दामों में कटौती

अगर हम केंद्र सरकार द्वारा डीजल-पेट्रोल के दामों में की गई एक्साइज कटौती पर विचार करते हैं तो इसमें कई अहम पॉइंट्स नजर आते हैं. पहला यह कि इससे सरकारी खजाने पर असर जरूर पड़ेगा. वहीं, टैक्स में की गई कटौती रेवेन्यू संबंधित कुछ प्रभावों के साथ लागू होगी. हालांकि, यह भी ध्यान रखना अहम है कि महामारी से होने वाले रेवेन्यू लॉस की भरपाई के लिए 2020 और 2021 में ईंधन पर टैक्स बढ़ाया गया था. तब से रेवेन्यू कलेक्शन में सुधार आया है और गुड्स एंड सर्विस टैक्स समेत बहुत कुछ हकीकत में प्रभावशाली स्तर पर है. भले ही सरकार ने यह फैसला लेकर राजकीय कोष पर बोझ बढ़ा दिया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की बढ़ती कीमतों को देखते हुए टैक्स में कटौती करना भी बेहद जरूरी था.

महामारी के दौर से उबरती वैश्विक अर्थव्यवस्था और धीमी शुरुआत समेत कुछ कारणों से दुनिया के कुछ हिस्सों की मुद्रास्फीति में काफी तेजी आ गई है. भारत इस मामले में भाग्यशाली रहा, क्योंकि मौजूदा दर के हिसाब से मुद्रास्फीति के स्तर में बड़ा बदलाव नहीं आया. हालांकि, ईंधन की लगातार बढ़ती कीमतों से उत्पादन की समग्र लागत प्रभावित होने का अनुमान हमेशा बना रहता है, जिसके दबाव में कुछ वस्तुओं की कीमतों में इजाफा हो जाता है. इसके अलावा ऐसे वक्त में जब सरकार निर्यात को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है, तब लोअर मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स की लागत जरूरी होती हैं. इसके लिए ईंधन की कीमतों में कमी करना बेहद जरूरी था.

अंत में, यह देखते हुए कि घरों की कंजप्शन बास्केट में भोजन के साथ ईंधन भी शामिल होता है. ऐसे में ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण करने की जरूरत थी, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति पर इसका असर दिखे. सरकार का यह फैसला खाद्य सामग्रियों पर कीमतों के बढ़ते दबाव को घटाने में सहायक होगा, जिससे आम आदमी पर बोझ कम होगा. जैसे कि ईंधन की कीमतों में कमी टैक्स कटौती के रूप में की गई है. ऐसे में सरकार पहले जारी किए गए ईंधन बांड के एवज में सब्सिडी नहीं दे रही है. इसके अलावा टैक्स रेवेन्यू में उछाल और निजीकरण में तेजी से यह उम्मीद है कि ईंधन की कीमतें घटाने के बावजूद सरकार बजट में बताई गई व्यय योजनाओं सहित अपने सभी वित्तीय कमिटमेंट पूरे कर लेगी. ऐसे में बुनियादी ढांचे के विकास का काम शायद बिना किसी रुकावट जारी रहेगा.

अंत में एक पॉइंट पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों का दबाव कम होगा और कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के नीचे वापस आ जाएगा. ऐसे में हमें ईंधन की कीमतों में कमी की उम्मीद करनी चाहिए, लेकिन यह अगले साल के मध्य तक ही हो सकता है. इस वक्त इकोनॉमिक रिबाउंड पर जोर देना उचित है, क्योंकि इसी रिबाउंड की वजह से ईंधन की कीमतों में कटौती संभव हुई. सभी प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों की प्रमुख सुर्खियां एक ही बात कह रही हैं कि भारत के विकास की कहानी फिर शुरू हो चुकी है. मजबूत विकास सावधानीपूर्वक किए गए प्लान्ड लक्ष्य का परिणाम है, जिसे लेबर, एग्रीकल्चर या फैक्टरिंग रेगुलेशन या बैड बैंक के क्रिएशन में आर्थिक सुधारों के तहत बड़े पैमाने पर सहायता दी गई. उस वक्त सरकार ने आपूर्ति पक्ष को देश के विकास की संभावनाओं के प्रति बाधा माना, जिससे अंतत: रिफॉर्म की शुरुआत हुई, जिसने उन्हें यथासंभव कम करने का प्रयास किया. अब परिणाम के रूप में हमारे पास आगामी विकास के लिए जरूरी पूर्वानुमान है, क्योंकि इकोनॉमी में उछाल आने से डिमांड भी बढ़ती है.

मजबूत विकास का मतलब ज्यादा टैक्स रेवेन्यू होता है और ज्यादा रेवेन्यू सरकारों को टैक्स घटाने या खर्च बढ़ाने या दोनों के कॉम्बिनेशन पर ध्यान देने में सक्षम बनाता है. यह अहम है, क्योंकि अधिकतर लोग रेवेन्यू को रैखिक रूप से देखते हैं और यह मानते हैं कि आप टैक्स में इजाफा करके रेवेन्यू बढ़ा सकते हैं. इस तरह का नजरिया इकोनॉमिक सेंटिमेंट्स और ग्रोथ पर टैक्स के असर को नजरअंदाज कर देता है.यह चर्चा इस वजह से अहम है, क्योंकि भारत में सिर्फ केंद्र सरकार ही पेट्रोल-डीजल पर टैक्स नहीं लगाती है. हकीकत में कुछ राज्यों में ईंधन की लागत का एक तिहाई हिस्सा सीधे राज्य सरकार के पास जाता है. इसके बावजूद केंद्र सरकार पर ईंधन की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती करने का दबाव हमेशा रहता है.

हमारे लिए यह समझना अहम है कि फ्यूल प्रॉडक्ट्स पर हाई टैक्स के लिए राज्य भी जिम्मेदार हैं. वे इस फंड का इस्तेमाल अक्सर कृषि ऋण माफी और अन्य नॉन-प्रॉडक्टिव खर्चों पर करते हैं, जो समस्याओं को सिर्फ बढ़ाता है. ईंधन की कीमतों में कटौती पर प्रेस रिलीज जारी करके राज्यों से अनुरोध किया गया है कि वे वैट की दरों में कमी करके उपभोक्ताओं को और राहत दें. हमारी राज्य सरकारों के लिए यह अहम है कि वे टैक्स रेट्स और टैक्स रेवेन्यू के बीच नॉन-लाइनर रिलेशनशिप को महसूस करें. अब उनके लिए मामला यह है कि वे अपनी वैट दरों में कटौती करके अपनी वित्तीय स्थिति के लिए योजनाएं बनाएं. राज्य स्तर पर होने वाले एक मजबूत वित्तीय सुधार से सार्वजनिक संसाधनों का कुशलतापूर्वक आवंटन होगा. वहीं, राज्य सरकारों को वैट फीसदी दर की जगह एक निश्चित राशि करना चाहिए, जो एक अच्छी शुरुआत हो सकती है.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button