फतेहपुर संसदीय सीट: पर्याप्त संख्या बल के बावजूद क्षीर्ण होती गई सवर्ण राजनीति की संभावनायें

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सांसदी के लिहाज से ब्राह्मण, कायस्थ, वैश्य के बाद अब क्षत्रियों की भी नगण्य हुई पूंछ!
फतेहपुर। गंगा और यमुना के बलुई संस्कार वाली फतेहपुर संसदीय सीट पर चुनावी जातीयता ने ऐसा घर किया कि बड़ी जातियों का पत्ता ही साफ हो गया। चुनावी दृष्टिकोण से अब यहाँ किसी भी पार्टी में सवर्णो की पूँछ न के बराबर है। अच्छा खासा संख्या बल होने के बावजूद उच्च तबके से विमुख हुई राजनीति के लिये वास्तव में उच्च तबका ही जिम्मेदार है। इस तबके को जब भी टिकट मिला अपनो की ही निपटाऊ सोच ने गिनती से ही अलग कर दिया।
उल्लेखनीय है कि फतेहपुर संसदीय सीट पर अब तक हुए सत्रह संसदीय चुनावों में आठ बार ऐसा मौका आया जब सवर्ण तबके से सांसद हुआ। यह पहला अवसर है जब लगातार दूसरे चुनाव में किसी भी पार्टी ने सवर्ण को प्रत्याशी नहीं बनाया है। अंतिम बार २००९ में भाजपा ने राधेश्याम गुप्ता को प्रत्याशी बनाया था, जिनकी जमानत जब्त हो गई थी। पूर्व में फतेहपुर सीट पर बतौर सवर्ण (ब्राह्मण) सांसद कांग्रेस से १९५२ के चुनाव में शिवदत्त उपाध्याय हुए।
इसके बाद १९६२ के चुनाव में जब जिलेवाद का नारा बुलंद हुआ तो गौरी शंकर कक्कड (पंजाबी खत्री/वैश्य) लोकसभा पहुँचे। १९६७ व १९७२ में कांग्रेस से संत बक्स सिंह (क्षत्रिय) जीते, १९८० और १९८४ में हरीकृष्ण शास्त्री (कायस्थ), १९८९ व १९९१ में वीपी सिंह (क्षत्रिय) सवर्ण सांसद हुए। बताते चले कि इतिहास में एक बार ब्राह्मण, एक बार (पंजाबी खत्री/वैश्य), चार बार क्षत्रिय, दो बार कायस्थ सांसद हुए है।
जबकि उस दौर के हाई प्रोफाइल चुनावों में १९७८ का वह चुनाव आज भी बहुत लोगों को याद है जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी प्रेमदत्त तिवारी को इंदिरा गांधी की दो दर्जन सभाओं के बावजूद जीत नहीं मिल पाई। इसके पूर्व १९७७ में संत बक्स सिंह, १९८९ में हरीकृष्ण शास्त्री, १९९६ में महेन्द्र प्रताप नारायण सिंह, कृष्ण कुमार उर्फ ककऊ सिंह व राम प्यारे पाण्डेय, १९९८ में देवेन्द्र प्रताप सिंह गौतम, २००४ में अचल सिंह और फिर २००९ में राधेश्याम गुप्ता सवर्ण प्रत्याशी तो हुए किंतु गैर सवर्णो की एकजुट्ता के चलते करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। इनमे सिर्फ पराजित महेन्द्र प्रताप नारायण सिंह की ही जमानत बच पाई थी।
संसदीय चुनाव के लिहाज से सवर्ण तबका (ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ, वैश्य) अपने सियासी पतन के लिये काफी कुछ स्वयं जिम्मेदार माना गया। नतीजतन २०१४ के बाद यह लगातार दूसरा चुनाव है जब किसी पार्टी ने सवर्णो को तरजीह नहीं दिया! बड़ी बात यह है कि भाजपा जिसकी ओर सवर्णो का झुकाव अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है। उसके केन्द्र में सवर्ण दूर-दूर तक शामिल नहीं है! बसपा ने तो कभी भी इस ओर सोचा ही नहीं। सपा का केंद्र भी २००४ के बाद बैकवर्ड आधरित हो गया। कांग्रेस ने भी इधर के कई चुनावों से सवर्णो से मुँह मोड़ लिया है।
ज्ञातव्य रहे कि मौजूदा समय में इस सीट पर सवर्णो का वोट पाँच लाख के करीब माना जाता है। बावजूद इसके यह तबका अब स्थानीय संसदीय परिदृश्य से पूरी तरह हट चुका है! बताते चले कि जातीय आँकड़ो का खेल यहाँ के संसदीय परिदृश्य में कुछ इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता रहा है कि सपा-बसपा गठबंधन व कांग्रेस ने बगैर हालातों और परिणामों का ख्याल किये एक ही जाति से प्रत्याशी बना दिये।
वही भाजपा के जानकारो को यह कहते हुए सुना गया कि फतेहपुर से साध्वी की जाति के अतिरिक्त कोई दूसरी जाति का प्रत्याशी अपना चुनाव खड़ा ही नहीं कर पायेगा! समय बदला, हालात बदले, ऐसी सवर्ण विरोधी आँधी चली कि आज इस सीट से सवर्ण राजनीति का सूर्य अस्त हो गया है जिसके लिये शायद सवर्ण तबका ही काफी हद तक जिम्मेदार है…!

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