अपने बच्चों के भविष्य के लिए फिक्रमंद हैं तो इसे जरूर पढ़ें

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Zubair Khan

वर्तमान समय में बच्चों की देखरेख और परवरिश करना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कोमल मन के बच्चे अपराध के दलदल में फंसते जा रहे हैं।हाल में हुई घटनाएं इसका ज्वलंत उदाहरण हैं।

बच्चों के विकास और व्यवहारिक प्रबंधन पर स्टूडेंटिंग एरा संस्थान द्वारा केयर 2017 कान्क्लेव का आयोजन दिल्ली स्थित पार्क होटल में किया गया था। इस कान्क्लेव में स्कूल एजुकेशन के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सेक्रेटरी अनिल स्वरूप समेत कई बुद्धिजीवियों ने अपनी राय रखी।कार्यक्रम में पूर्व बालीवुड अभिनेत्री व योगगुरू अनु अग्रवाल ने कहा कि योगा व मेडिटेशन इन सबमें एक रामबाण साबित हो सकता है। विदेशों की कई बड़ी यूनिवर्सिटी में इसे अपनाया गया है। और इसके परिणाम काफी हद तक सकारात्मक मिले हैं।

इस दौरान पैनल सत्र के आयोजन के समय पैनलिस्ट सईद कौसर का कहना था कि बच्चों को इन बाल अपराध की समस्याओं से निकालने-उबारने तथा उनके विकास के लिए सर्वोपरि आवश्यकता है कि स्कूल व परिवार में बच्चों को समुचित ढंग से भावनात्मक पोषण मिले।इसमें स्कूल और घर दोनों को मिलकर बच्चों के विकास में सहयोग करना होगा।हम सिर्फ स्कूल पर ही बच्चे की सारी जिम्मेदारी नहीं डाल सकते हैं। मूलचंद अस्पताल के सीनियर मनोवैज्ञानिक डा. जितेद्र नागपाल का भी मानना था कि स्कूलों में काउंसलर्स की भारी कमी के चलते भी इस प्रकार की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।कई पैनलिस्ट ने इस बात का भी समर्थन किया कि इन सबमें खासी जिम्मेदार हमारी लाइफस्टाइल है।हम बच्चों को पैसे देने में नहीं सकुचाते हैं लेकिन वास्तव में एक बच्चे के विकास में सर्वांगीण विकास निभाने के लिए उसे अपने माता- पिता के साथ की आवश्यकता होती है जिसकी भारी कमी है।स्टूडेंटिंग एरा संस्थान के संस्थापक राजादास गुप्ता ने बच्चों के इस हाल के लिए कहीं ना कहीं एकल परिवार को भी जिम्मेदार माना। शीर्ष पैनलिस्ट में प्रिया भार्गव,अल्का शर्मा, कर्नल प्रताप सिंह, राजशेखरन पिल्लई जैसी हस्तियां मौजूद रहीं।इस मामले में साईबर एक्सपर्ट गुरुराज पी का कहना था कि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि सोशल मीडिया ने अपराध बढ़ाने में भूमिका निभाई है। इंटरनेट का इस्तेमाल किस हद तक करना है और बच्चों को इससे होने वाले दुष्प्रभावों को समझाना जरूरी है।

समाज में किशोरों की बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति चिंताजनक:

​आज समाज में होने वाले कई संगीन व गंभीर अपराधों में किशोरों की भागीदारी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बुरी आदत और संगत में पड़ कर बच्चे अपनों का खात्मा करने से भी गुरेज नहीं करते हैं और अपराधिक प्रवृत्ति अपना लेते हैं। हत्या, बलात्कार, डकैती, अपहरण जैसी संगीन घटनाएं आज किशोरों द्वारा बड़े पैमाने पर अंजाम दी जा रही हैं। साल 2014 में गिरफ्तार होने वाले किशोरों में 75 प्रतिशत संख्या सोलह साल से ज्यादा किशोरों की रही।आंकड़ों के मुताबिक कुल किशोर अपराधियों में से 90 प्रतिशत किशोर अपराधी दसवीं भी पास नहीं हैं। साथ ही 90 प्रतिशत किशोर अपराधी ऐसी आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि से हैं जिनके परिवारों की आमदनी साल में एक लाख से भी कम है।यही वजह से आज पांचवीं, छठवीं, सातवीं कक्षा से ही छोटे-छोटे बच्चे मर्यादाओं की सभी सीमाएं लांघ चुके हैं।मनोवैज्ञानिकों ने अनेक ऐसे भी कारक गिनाए हैं जिनसे बाल-अपराधों में वृद्धि पाई गई है जैसे भय, अकेलापन, असुरक्षा भावनात्मक द्वन्द्व, निम्न जीवन स्तर, पारिवारिक अलगाव, पढ़ाई के बढ़ते बोझ के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, आधुनिक सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक एवं पारिवारिक कारक भी किशोरों को अपराध की ओर ले जाते हैं।

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